सेंसलेस समझा रहे सेंसरबोर्ड को

अभी कुछ दिन पहले फिल्म " लिपस्टिक अन्डर माई बुर्का " को सेंसरबोर्ड ने कोई भी सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया । फिर प्रकाश झा समेत तमाम फिल्मी हस्तियाँ सेंसरबोर्ड पर उन्हे हत्तोतसाहित करने का आरोप लगा दिया , और उसकी ऐसी - तैसी करने लगे । सेंसरबोर्ड और बालीवुड का यह विवाद  कोई नया नहीं हैं । ये बालीवुड वाले चाहते हैं कि दर्शक तय करे उसे क्या देखना हे क्या नहीं । यानी कि हम अपने बड़ों के साथ फिल्म थियेटर जाए और ये अश्लिल फिल्म / नफरत फैलाने वाळी फिल्म परोस दे और  फिर वहाँ हम तय करें यह फिल्म हमें देखना है या नहीं ।
सेंसरबोर्ड का काम है समाज में अश्लिता फैलाने वाळी या नफरत फैलाने वाळी फिल्में या यह कहें असंवेदनसील फिल्में न पहुँचे जिससे समाज तर नकारात्मक प्रभाव पडे ।

ये साले सब क्रियेटिवटी के नाम पर हिन्दुस्तान के संस्कृति और विरासत को खत्म कर रहे हैं  । 

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