स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है

स्वामी विवेकानन्द जी का कथन हैं जीवात्मा की वासभूमि इस शरीर से ही कर्म की साधना होती है। जो इसे नरककुण्ड बना देते हैं वो अपराधी हैं और जो इस शरीर की रक्षा में प्रयत्नशील नहीं होते वे भी दोषी हैं।
शारीरिक दुर्बलता कम से कम हमारे एक तिहाई दुखों का कारण हैं।


नियमित व्यायाम के बिना यह शरीर स्वस्थ नहीं रह सकता। अशुद्ध जल और अशुद्ध भोजन रोग का घर है । शारीरिक स्वास्थ्य के लिए रोज सुबह उठो , टहलों , शारीरिक परिश्रम करो । यदि शरीर अस्वस्थ रहेगा तो मन कैसे स्वस्थ रह पाएगा।

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