एक आदर्श शिक्षक और प्रेरणा स्रोत डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन

5 सितंबर सन 1818 को तमिलनाडु को मद्रास में जन्में में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन अपने जीवन के 40 वर्ष शिक्षक के रूप में व्यतीत किये। डॉक्टर राधाकृष्णन एक प्रख्यात शिक्षाविद् तो थे ही एक दार्शनिक, उत्कृष्ट वक्ता, और एक हिंदू विचारक भी थे।

आजादी के बाद डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति बने और उसके बाद यह भारत के दूसरे राष्ट्रपति भी बने।

डॉ राधाकृष्णन कहते थे  कि किताबें पढ़ना हमें एक चिंतन व सच्चे आनंद की अनुभूति देता है जिसके माध्यम से हम दो संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं।
शिक्षक के रूप में उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि उन्होंने अपना जन्मदिन अपने व्यक्तिगत नाम से नहीं बल्कि संपूर्ण शिक्षक को सम्मानित किए जाने के उद्देश्य से शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की इच्छा व्यक्त की। जिसके बाद आज की पुरे देश में इनके जन्मदिन 5 सितंबर को प्रतिवर्ष शिक्षक दिवस के रूप में देश मनाता है।
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन पूरे संसार को एक शिक्षालय मानते थे ।
उनका मत था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव अपने मस्तिष्क का सदुपयोग कर सकता है । इसलिए समस्त विश्व को एक इकाई मानकर ही शिक्षा का प्रबंध किया जाना चाहिए इससे समाज की अनेक बुराइयों को जड़ से मिटाया जा सके।

वह शिक्षकों के लिए यह कहते थे कि जब तक एक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्घ नहीं होता, साथ ही शिक्षा को एक मशीन के रुप में नहीं लेगा तब तक अच्छी शिक्षा की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
 शिक्षक केवल उन्हीं लोगों को बनाया जाना चाहिए जो सबसे अधिक बुद्धिमान हो इसके अलावा शिक्षक को अच्छी तरह अध्यापन करके ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए बल्कि उसे अपने छात्रों का स्नेह और आदर भी प्राप्त करना चाहिए।

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